तेज दौडते VIP वाहनों की धौंस और सडक पर आम आदमी का जान बचाने का संघर्ष, कब रुकेगा यह ख़तरा?”*
लोकेशन रायपुर
राजीव खरे ब्यूरोचीफ
“ *तेज दौडते VIP वाहनों की धौंस और सडक पर आम आदमी का जान बचाने का संघर्ष, कब रुकेगा यह ख़तरा?”*
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कुछ दिन पहले हुई एक गंभीर घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है—क्या VIP के लिए आम लोगों की जान की कीमत बिल्कुल भी मायने नहीं रखती?
Visuals:
क्षतिग्रस्त पायलटिंग स्कॉर्पियो, सड़क पर फैले मलबे, रात का शॉट, पुलिस वाहन।
सूत्रों के मुताबिक, उद्योग विभाग के VIP काफिले की पायलटिंग कर रही स्कॉर्पियो अचानक हादसे का शिकार हो गई। घटना तो कुछ दिनों पुरानी है, लेकिन इसके बाद से उठा सवाल आज भी उतना ही ज़रूरी है—आख़िर कब तक VIP काफ़िले इस तरह सड़कों पर रफ्तार से दौड़ते रहेंगे, और कब तक आम नागरिक ख़तरे में डालते रहेंगे?
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काफिलों के तेज़ रफ्तार फुटेज, सड़क पर भीड़, हॉर्न की आवाज़।
हैरान करने वाली तस्वीरें सामने आईं हैं—पायलट वाहन के अंदर बैठे एक पुलिसकर्मी को साफ़ तौर पर खिड़की से डंडा बाहर निकालकर लोगों को धमकाते देखा गया। मानो सड़क उनका “निजी रास्ता” हो और आम जनता सिर्फ़ एक बाधा।
यह सिर्फ़ एक वाहन दुर्घटना नहीं—यह हमारी व्यवस्था की सोच पर बड़ा सवाल है। VIP संस्कृति, सुरक्षा के नाम पर, क्या जनता का दमन बन चुकी है?
कहते हैं लोकतंत्र में जनता सबसे ऊपर होती है, लेकिन तस्वीरें कुछ और ही कहानी बयां करती हैं। रायपुर में हुए इस हादसे में भले ही कोई बड़ी जनहानि नहीं हुई, पर इसने एक पुराना और खतरनाक सच फिर उजागर कर दिया—VIP काफ़िलों की दौड़ती गाड़ियों से सबसे अधिक खतरा उसी जनता को होता है जिसके नाम पर ये कुर्सियां मिली हैं।
तेज़ साइरन, रोड ब्लॉक, लाल-पीली बत्तियाँ, और फिर सुरक्षा कर्मियों का जनता को डराने-धमकाने का तरीका—यह सब किसी लोकतांत्रिक राज्य से ज्यादा सामंती मानसिकता जैसा दिखता है।
सबसे गंभीर बात यह कि पायलट वाहन का एक पुलिसकर्मी खिड़की से डंडा बाहर निकालकर लोगों को रास्ता साफ़ करने का “आदेश” देता दिखा। यह सिर्फ़ अनुशासनहीनता नहीं—यह जनता के प्रति असम्मान है। यह संकेत है कि VIP की सुरक्षा के नाम पर आम लोगों की जान और गरिमा को कोई अहमियत नहीं दी जा रही।
ऐसी घटनाएँ बार-बार होती हैं। कभी एम्बुलेंस को VIP काफिले के लिए रोक दिया जाता है, कभी स्कूल बसों को किनारे लगा दिया जाता है। सवाल यह नहीं कि VIP सुरक्षा ज़रूरी है या नहीं—सवाल यह है कि क्या यह सुरक्षा जनता के सम्मान और सुरक्षा की कीमत पर मिलेगी?
अब ज़रूरत है ठोस नियमों की—
VIP काफ़िलों की गति सीमित हो
साइरन का दुरुपयोग रोका जाए
पायलट वाहनों में कैमरे अनिवार्य हों
पुलिसकर्मियों के व्यवहार पर सख़्त निगरानी हो
लोकतंत्र में जनता का रास्ता VIP से छोटा नहीं हो सकता।
जब तक सड़कों पर VIP रौब कम नहीं होगा, तब तक हादसे, सवाल और असंतोष—सब बढ़ते रहेंगे।
सड़क सबकी है, सुरक्षा सबकी है—और सम्मान भी सबका होना चाहिए।