रमज़ान का मुबारक महीना 19 फ़रवरी 2026 से शुरू, पहले रोज़े के साथ इबादतों का सिलसिला तेज़*
*रमज़ान का मुबारक महीना 19 फ़रवरी 2026 से शुरू, पहले रोज़े के साथ इबादतों का सिलसिला तेज़*
*रमजान बरकत और रहमतों वाला महीना चालू इस माह मे कुराआनें मजी़द नाजिल हुई इसी माह में एक रात ऐसी भी आती है जिसे शबे कद्र भी कहते हैं यह रात हजारों रातों से भी अफजल होती है*
*रिपोर्टर – एम पी सी जी Sky इंडिया टीवी से एमपी हेड मोहम्मद शमीम अहमद खान की रिपोर्ट*
19 फ़रवरी 2026 से पवित्र रमज़ान माह की शुरुआत हो गई है। चांद दिखाई देने के बाद मुस्लिम समुदाय ने पहला रोज़ा रखा। इस्लामी हिजरी कैलेंडर के अनुसार रमज़ान का महीना चांद के दीदार पर निर्भर करता है। 29 या 30 रोज़ों के बाद जब शव्वाल का चांद नज़र आता है, तब ईद-उल-फ़ित्र मनाई जाती है रमज़ान इस्लाम के पांच बुनियादी स्तंभों में से एक है। रोज़ा रखना हर बालिग़ और सेहतमंद मुसलमान पर फर्ज़ है। यह महीना सब्र, शुक्र, तक़वा और आत्म-सुधार का महीना माना जाता है। रोज़ा केवल भूखे और प्यासे रहने का नाम नहीं, बल्कि बुरी बातों, झूठ, ग़ीबत, ग़ुस्से और बुरे कर्मों से खुद को बचाने का एक बेहतरीन जरिया है रोज़ा इंसान को अपने नफ़्स पर काबू करना सिखाता है और अल्लाह की याद में जीवन बिताने की प्रेरणा देता है।
*रमज़ान की फज़ीलत*
इस्लामी मान्यता के अनुसार रमज़ान रहमत, मग़फिरत और जहन्नम से निजात का महीना है। हदीसों में आता है कि इस महीने में जन्नत (स्वर्ग) के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, जहन्नम (नरक) के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं और शैतानों को क़ैद कर दिया जाता है। इस माह में की गई इबादत का सवाब कई गुना बढ़ा दिया जाता है। नफ़्ल इबादत का सवाब फर्ज़ के बराबर और फर्ज़ का सवाब सत्तर गुना तक बढ़ा दिया जाता है।
इसी पवित्र महीने में कुरआन मजी़द आसमानी किताब नाजिल की गई रमज़ान की 27वीं रात को शब-ए-क़द्र माना जाता है, जिसे “हज़ार महीनों से बेहतर” बताया गया है। इस रात की गईं इबादत का सवाब बहुत बड़ा माना जाता है और मुसलमान पूरी रात नमाज़, तिलावत और दुआ में गुज़ारते हैं
*तरावीह की नमाज़ की फज़ीलत*
रमज़ान की खास इबादतों में से एक है तरावीह की नमाज़। यह नमाज़ ईशा की नमाज़ के बाद अदा की जाती है। आमतौर पर 20 रकअत तरावीह पढ़ी जाती है, हालांकि कुछ जगहों पर 8 रकअत भी अदा की जाती है। मस्जिदों में हाफ़िज़-ए-कुरआन बिना देखे पूरा कुरआन तरावीह में सुनाते हैं, यह सिलसिला 27 में सबको मुकम्मल हो जाता है यानी 27 वीं सबको तरावीह पूरी हो जाती है जिसे “ख़त्म-ए-कुरआन” कहा जाता है।
हदीस में आता है कि जो व्यक्ति ईमान और सवाब की नीयत से रमज़ान की रातों में क़ियाम (नमाज़) करता है, उसके पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं। तरावीह का मकसद सिर्फ़ नमाज़ पढ़ना नहीं, बल्कि कुरआन से जुड़ना, दिल को नरम करना और अल्लाह के करीब होना है।
*रोज़े का सामाजिक और स्वास्थ्य पक्ष*
रमज़ान का महीना समाज में बराबरी और हमदर्दी का भाव भी पैदा करता है। रोज़ा रखने वाला इंसान भूख और प्यास की तकलीफ़ को महसूस करता है, जिससे उसमें ग़रीबों और ज़रूरतमंदों के प्रति संवेदना बढ़ती है। इसी महीने में ज़कात (दान)और सदक़ा देने पर खास ज़ोर दिया जाता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार संतुलित और सही तरीके से रखा गया रोज़ा शरीर को आराम देता है, पाचन तंत्र को संतुलित करता है और अनुशासित जीवनशैली अपनाने में मददगार साबित होता है।
रमज़ान का पवित्र महीना इबादत, सब्र, त्याग और आत्मशुद्धि का संदेश देता है। मस्जिदों में रौनक बढ़ गई है, लोग सेहरी और इफ्तार की तैयारियों में जुटे हैं और हर ओर आध्यात्मिक माहौल देखने को मिल रहा है। यह महीना आपसी भाईचारे, मोहब्बत और इंसानियत को मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है।

