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आवारा कुत्ते, अदालत के निर्देश और जनता की सुरक्षा*

*आवारा कुत्ते, अदालत के निर्देश और जनता की सुरक्षा

भारत की सड़कों पर आवारा कुत्तों का संकट अब केवल नगर निगमों या पशुप्रेमियों के विवाद तक सीमित नहीं है। यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। हर साल लाखों लोग कुत्तों के काटने के शिकार होते हैं और इनमें से बड़ी संख्या बच्चों और बुज़ुर्गों की होती है। आधिकारिक आँकड़े बताते हैं कि 2024 में पूरे देश में 37 लाख से अधिक कुत्ता काटने के मामले दर्ज हुए। औसतन रोज़ दस हज़ार नागरिक अस्पताल पहुँच रहे हैं। यह महज़ किसी समाजसेवी संगठन की चेतावनी नहीं, बल्कि सरकारी पोर्टल पर दर्ज तथ्य हैं।

समस्या केवल काटने की घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इनके बाद शुरू होता है एक और संकट—अस्पतालों में एंटी-रेबीज़ वैक्सीन की कमी। यह विडंबना है कि जिस देश में सबसे ज़्यादा लोग रेबीज़ का शिकार होते हैं, वहीं समय पर इंजेक्शन न मिल पाने की वजह से हज़ारों लोग हर साल मौत के मुँह में चले जाते हैं। कई बार परिवारजन अस्पताल से अस्पताल भटकते हैं और सरकारी स्टॉक खत्म होने पर निजी मेडिकल स्टोर से ऊँचे दामों पर इंजेक्शन खरीदने को मजबूर होते हैं।

यहाँ पर अदालत की भूमिका अहम हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल में यह स्पष्ट किया है कि एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियम, 2023 के अनुसार उपचारित और नसबंदी किए गए कुत्तों को उसी क्षेत्र में वापस छोड़ना ज़रूरी है। लेकिन अगर कोई कुत्ता रेबीज़-संक्रमित हो, या आक्रामक व्यवहार करता हो, तो उसे शेल्टर में रखना अनिवार्य होगा। अदालत ने साथ ही यह भी कहा कि नगर निकायों को नामित फीडिंग ज़ोन बनाने होंगे और सड़कों पर अव्यवस्थित ढंग से कुत्तों को खाना खिलाने पर रोक लगानी होगी। यह संतुलन साधने की कोशिश है—पशुओं के प्रति करुणा और इंसानों की सुरक्षा के बीच।

लेकिन सच्चाई यह है कि सरकारी एजेंसियाँ अदालत के निर्देशों को केवल काग़ज़ों पर निभाती हैं। नगर निगमों के पास न तो पर्याप्त डॉग-कैचर दल हैं, न ही ऑपरेशन थिएटर और न ही पोस्ट-ऑप देखभाल की व्यवस्था। नसबंदी और टीकाकरण का काम जिस तेज़ी से होना चाहिए, वह कहीं दिखाई नहीं देता। परिणाम यह है कि कुत्तों की संख्या बेकाबू बढ़ रही है और हादसे लगातार बढ़ रहे हैं। नागपुर, भोपाल, लखनऊ, पटना जैसे शहरों में कुत्ता काटने के मामलों में बीते वर्षों में 50–60 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज हुई है।

अब सवाल यह है कि ज़िम्मेदारी किसकी है? कानून साफ़ कहता है कि यह नगर निकायों की ज़िम्मेदारी है कि वे कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण सुनिश्चित करें। मगर निचले स्तर पर फंड की कमी, स्टाफ की उदासीनता और ठेकेदारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार ने पूरे सिस्टम को पंगु बना दिया है। जब तक राज्य सरकारें और नगर निकाय इसे पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी मानकर ठोस कार्य-योजना नहीं बनाएँगे, तब तक अदालतें भी केवल दिशा-निर्देश ही देती रह जाएँगी।

आवश्यक है कि—
1. हर शहर में वार्ड-वार डॉग सेंसस हो और सालाना लक्ष्य तय किया जाए कि कितने कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण होना है।
2. एंटी-रेबीज़ वैक्सीन और सीरम का कम से कम तीन महीने का बफ़र स्टॉक हर जिला अस्पताल में उपलब्ध हो।
3. स्कूली बच्चों को पढ़ाई के साथ यह सिखाना अनिवार्य हो कि कुत्ते के काटने पर तुरंत घाव को धोना और अस्पताल पहुँचना क्यों ज़रूरी है।
4. आक्रामक और रेबीज़-संदिग्ध कुत्तों के लिए अलग से सरकारी शेल्टर बनाए जाएँ।
5. सड़क पर बेतरतीब फीडिंग रोककर निर्धारित फीडिंग ज़ोन बनाए जाएँ ताकि कुत्ते सड़क पर झुंड बनाकर आक्रामक न हों।

यह विडंबना है कि जिस देश में चंद्रयान और जी-20 की कामयाबी की बातें होती हैं, वहाँ आज भी लोग इसलिए मर जाते हैं क्योंकि उन्हें कुत्ता काटने के बाद समय पर इंजेक्शन नहीं मिला। यह न तो विज्ञान की कमी है और न ही धन की, यह महज़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है।

आवारा कुत्तों का संकट किसी एक वर्ग का मुद्दा नहीं है। यह आम नागरिक की सुरक्षा, बच्चों की ज़िंदगी और समाज की सामूहिक ज़िम्मेदारी का सवाल है। अदालत ने संतुलित आदेश देकर रास्ता दिखाया है, अब ज़रूरत है कि सरकारें अपने दायित्व से भागने की बजाय ठोस कार्रवाई करें। क्योंकि अदालत के आदेश से कुत्ते नहीं रुकेंगे, लेकिन प्रशासनिक इच्छाशक्ति से मौतों और दुर्घटनाओं को ज़रूर रोका जा सकता है।

**(राजीव खरे- ब्यूरो चीफ छत्तीसगढ़) **

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