शराब के कारोबार पर ‘राजस्व’ की खेती: क्या सरकारों ने जनता की जान को दांव पर लगा दिया?*
*शराब के कारोबार पर ‘राजस्व’ की खेती: क्या सरकारों ने जनता की जान को दांव पर लगा दिया?
राजस्व की बलि पर किसी समाज की नैतिकता और सुरक्षा की कीमत चुकाना शर्मनाक है — लेकिन यही वह तस्वीर है जो आज छत्तीसगढ़ के कई हिस्सों में नजर आती है। सरकारी खज़ाने की रौनक बढ़ाने के नाम पर हर मोहल्ले, हर चौराहे और स्कूल-कॉलिज़ के रास्ते के पास धीरे-धीरे शराब की दुकानें और उनके आस-पास के अहाते खड़े होते जा रहे हैं। इन छोटी-छोटी दुकानों के पीछे कितनी बड़ी-बड़ी कीमतें छुपी हैं — यह समझना अब समय की ज़रूरत है।
*मोहल्लों में अहाते, सड़क पर आतंक*
गुज़रते हुए मोहल्लों में आज जो सबसे पहले दिखता है, वह शराब की दुकान के समक्ष जमा भीड़ है — सुबह-दोपहर, शाम और रात, हर वक्त। अहातों में जमा लोग अक्सर नशे की दशा में आते-जाते हैं; छोटी-छोटी कहासुनी से लेकर खुला बदसलूकी और गुंडागर्दी तक का दायरा बढ़ता जा रहा है। स्थानीय युवतियाँ-महिलाएँ सार्वजनिक जगहों पर अकेले निकलने में डरती हैं। स्कूल-कॉलेज के रास्तों पर शराबखानों की मौजूदगी ने बच्चों के सामने असुरक्षा की एक नई परत जमी कर दी है — कन्याएँ, अभिभावक और अध्यापक इस बदलते माहौल से चिंतित हैं।
सिर्फ़ सामाजिक असहजता ही नहीं — सच्चाई यह है कि शराब के इर्द-गिर्द बढ़ती हिंसा, सड़क हादसे और सार्वजनिक व्यवस्था में गिरावट का एक मूर्त सम्बन्ध बन चुका है। कई जगहों पर अहातों की वजह से सड़क का नज़ारा बदल जाता है; पार्किंग, दुकान-खोलने-बंद करने की अराजकता और जाम लगता है — रोज़मर्रा की ट्रैफ़िक समस्या बन चुकी है।
*पुलिस, प्रशासन और नीति: जोरों की चुप्पी*
कठोर सवाल यह है: जब समाज दहशत में है, तो प्रशासन चुप क्यों बैठा है? वहाँ-वहाँ होने वाली शिकायतों के बावजूद अक्सर कार्रवाई न करने का तर्क यही दिया जाता है कि यह कानूनी व्यवसाय है — लाइसेंस है, ठेका है, और राजस्व आ रहा है। लेकिन क्या राजस्व अर्जित करने का मतलब जनजीवन के अधिकारों को कुचल देना है? जब महिलाओं को पास-पास की गली से होकर स्कूल चलना डर लगे, जब रात में मोहल्ले का माहौल असुरक्षित हो — तब ‘निगरानी’ और ‘नियम-कानून’ का रोना ही काफी नहीं।
*राजस्व का दबाव — नशा क्यों प्राथमिक स्रोत बन गया?*
राज्य-सरकारें भले ही विकास बैंकिंग, शिक्षा व स्वास्थ्य के नाम पर योजनाएँ घोषित करती हों, पर कड़वा सच यही है कि *सत्ता के लिये लोकलुभावन योजनाओं में पैसे बांटने के चक्कर में राज्यों का राजस्व की हालत ख़स्ता हो गई है।* और राजस्व की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सरकार के पास शराब पर निर्भरता के अलावा विकल्प कम हैं। छत्तीसगढ़ की नीति में भी शराब पर निर्भरता स्पष्ट है: राज्य में लगभग 670-675 सरकारी-अनुमोदित शराब दुकानें संचालित थीं/हैं, और इन दुकानों से प्रतिदिन करोड़ों रूपये की नकदी जनित होती है — यही असल में एक बड़ा प्रेरक है कि नई दुकानों और अहातों के लिये अनुमति जारी की जाती रही। जब शासकीय धन-आवश्यकता और योजनाओं के व्यय के बीच संतुलन बिगड़ता है, तो नीतिनिर्माता अक्सर तात्कालिक राजस्व के रास्ते पर चलना चुनते हैं — और शराब इसका सबसे आसान साधन बन जाता है।
*आंकड़े बोलते हैं — लेकिन किसकी सुनेंगे?*
सिर्फ़ अनुभव-कथा नहीं — सख़्त आंकड़े भी चिंतित करने वाले हैं। राज्य में एक्सिस-डाटा और मीडिया रिपोर्टिंग यह संकेत देती है कि सड़क हादसों की संख्या और उनमें होने वाली मौतें लगातार उच्च स्तर पर बनी हुई हैं — प्रतिमाह औसतन हज़ारों दुर्घटनाएँ और सैकड़ों जानें ली जा रही हैं। वह भी उन इलाकों में जहाँ भारी-भारी वाहनों का डेरा, ट्रक-ट्रैफ़िक और शराब विक्रेता साथ-साथ हैं। (आंकड़ों का संक्षेप: राज्य में दुकान-संख्या ~672–674; दुकानों से रोज़ाना करोड़ों की नकदी; सड़क हादसों के मासिक और वार्षिक आंकड़े चिंताजनक उन्मुख।)
*सामाजिक स्वास्थ्य पर असर — नशे की चादर*
नशा सिर्फ हिंसा नहीं बढ़ाता; यह सामाजिक बुनावट को खोखला कर देता है। घरेलू हिंसा, पारिवारिक टूटन, अव्यवस्था और युवा-आपदाएँ — ये सारे दुष्परिणाम तब और गहरे होते हैं जब शराब सस्ती हो, उपलब्धता बढ़े और नियंत्रण ढीला हो। महिलाओं और बच्चों के प्रति असुरक्षा बढ़ती है, और सामाजिक-आयुर्विज्ञान कमजोर पड़ता है। दूसरी ओर, अवैध शराब और भ्रष्टाचार के मामलों में भी इजाफ़ा दर्ज हुआ है — जिससे न केवल जानों का खतरा बढ़ता है, बल्कि शासन-व्यवस्था में भयावह क्षति भी पहुँचती है।
*सरकार के पास विकल्प हैं* —
यह कहना अनुचित नहीं होगा कि सरकार के पास राजस्व बढ़ाने के और भी रास्ते हैं — बेहतर कर प्रशासन, संपत्ति-कर सुधार, डिजिटाइजेशन, बड़े उद्योगों की आय-वृद्धि और व्यावहारिक आर्थिक नीतियाँ। परन्तु तात्कालिक लाभ की लालसा ने शराब व्यापार को प्राथमिकता दे दी है। क्या वह रास्ता विवेकपूर्ण है जो अगली पीढ़ियों को असुरक्षित सड़कों, टूटते-बिखरते परिवारों और बढ़ती हिंसा के रूप में लौटकर आए?
*क्या किया जाना चाहिए* —
1. अहाते और शराब की दुकानों का पक्का मानचित्रण — शिक्षा संस्थानों और आवासीय इलाकों से न्यूनतम दूरी तय की जाए; नियमों का तत्काल प्रवर्तन।
2. सख्त लाइसेंस नीति और समयबद्ध नवीनीकरण — उन दुकानों के लाइसेंस रद्द किए जाएँ जिनसे बार-बार शिकायतें आती हों।
3. पुलिस-निगरानी और कम्युनिटी-पुलिसिंग — मोहल्ला स्तर पर महिला-सुरक्षा दल और निष्क्रिय क्षेत्रों में पेट्रोलिंग बढ़ाई जाए।
4. आर्थिक विकल्प और वैकल्पिक राजस्व योजनाएँ — शराब पर निर्भरता घटाने के लिये वैकल्पिक कर-स्रोत और निवेश आकर्षित करने की नीति लागू की जाए।
5. जन-साक्षरता और नशा मुक्ति कार्यक्रम — स्कूलों और कॉलेजों में नशा-विरोधी पाठ्यक्रम और समुदाय स्तर पर पुनर्वास केंद्र बढ़ाये जाएँ।
*जनधन नहीं, जनजीवन बचाइए*
राजस्व-संकट के बहाने जनता की सुरक्षा को पीछे धकेलना स्वीकार्य नहीं। सरकार का कर्तव्य है कि वह परिमाण और गुणवत्ता — दोनों में सोचकर नीति बनाए: राजस्व के साथ-साथ जीवन की सुरक्षा भी प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि आज हम चुप रहें और मोहल्लों में शराब-अहातों को, स्कूल-रास्तों पर खड़ी-खड़ी खतरनाक दुकानों को बढ़ने दें, तो कल यही निर्णय समाज को भारी कीमत अदा करवा देगा।
सरकार को तुरंत स्पष्ट करना चाहिए: क्या उसकी प्राथमिकता जनजीवन है, या तुरंत की आय? इसका जवाब मिलने में देरी न करें — वरना तब मामलों की सुध लेना अदालतों का और समाज का काम रह जाएगा, जबकि जिंदगियाँ लौटकर नहीं आएँगी।
(राजीव खरे, ब्यूरो चीफ़ छत्तीसगढ़)