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जब नेशनल अवॉर्ड जीतकर भी दुखी हुए थे चिरंजीवी, 1988 का वो किस्सा आज भी नहीं भूले

नेशनल अवॉर्ड जीतने के बावजूद चिरंजीवी को समारोह में भेदभाव महसूस हुआ था। 2022 में उन्होंने ‘आचार्य’ के प्री-रिलीज इवेंट में 1988 की उस घटना को याद किया था।

नेशनल अवॉर्ड हाथ में, फिर भी चिरंजीवी को क्यों हुआ था अपमान का एहसास? 1988 का वो किस्सा

साउथ सिनेमा के सुपरस्टार चिरंजीवी ने अपने लंबे करियर में कई बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं। लेकिन उनकी जिंदगी में एक ऐसा भी पल आया, जब हाथ में प्रतिष्ठित नेशनल अवॉर्ड होने के बावजूद उनके मन में खुशी के बजाय एक टीस घर कर गई थी। यह घटना साल 1988 की है, जब चिरंजीवी को उनकी फिल्म ‘रुद्रवीणा’ के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

कई साल बाद चिरंजीवी ने खुद उस पुराने अनुभव को याद किया और बताया कि नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स के समारोह के दौरान उन्हें किस तरह साउथ सिनेमा को लेकर भेदभाव महसूस हुआ था।

2022 में सुनाया था 1988 का किस्सा

चिरंजीवी ने साल 2022 में अपनी फिल्म ‘आचार्य’ के प्री-रिलीज इवेंट के दौरान इस घटना का जिक्र किया था। उन्होंने बताया कि 1988 में नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स के समारोह में जाने से पहले वह काफी उत्साहित थे। आखिर उन्हें उनकी फिल्म के लिए देश के प्रतिष्ठित फिल्म पुरस्कारों में से एक मिलने वाला था।

लेकिन समारोह स्थल पर पहुंचने के बाद वहां का माहौल देखकर उनकी खुशी कुछ कम हो गई।

चिरंजीवी के मुताबिक, नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स के ऑडिटोरियम की दीवारों पर हिंदी सिनेमा के कई बड़े कलाकारों और दिग्गजों की तस्वीरें लगी हुई थीं। उन्हें लगा कि भारतीय सिनेमा की इतनी बड़ी तस्वीर में दक्षिण भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गजों को भी प्रमुखता मिलनी चाहिए।

दीवारों पर हिंदी सिनेमा का जलवा, साउथ के दिग्गज गायब

चिरंजीवी ने बताया था कि ऑडिटोरियम में हिंदी सिनेमा से जुड़े कई बड़े नामों की तस्वीरें लगी थीं, लेकिन साउथ इंडियन सिनेमा के दिग्गज कलाकारों की मौजूदगी बेहद कम दिखाई दे रही थी।

उनके मुताबिक, दक्षिण भारत से उन्हें सिर्फ मलयालम सिनेमा के दिग्गज प्रेम नजीर की तस्वीर नजर आई। इसके अलावा तमिल सिनेमा से एमजीआर और जयललिता की एक साथ तस्वीर लगी हुई थी।

चिरंजीवी को यह बात खली। उन्हें लगा कि दक्षिण भारतीय सिनेमा का भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में बेहद महत्वपूर्ण योगदान रहा है, लेकिन समारोह की सजावट में उसे वह जगह नहीं मिली, जिसकी वह हकदार थी।

यही वजह थी कि पुरस्कार मिलने की खुशी के बीच उनके मन में एक तरह की निराशा और टीस पैदा हो गई।

हाई-टी के दौरान भी महसूस हुई कमी

चिरंजीवी ने बताया था कि अवॉर्ड समारोह से पहले वहां हाई-टी का आयोजन किया गया था। उस दौरान पूरा माहौल भारतीय सिनेमा के बड़े नामों से जुड़ा हुआ था।

लेकिन जब उन्होंने आसपास की तस्वीरों और वहां मौजूद प्रतिनिधित्व पर गौर किया तो उन्हें साउथ सिनेमा के कई बड़े दिग्गजों की कमी महसूस हुई।

चिरंजीवी के लिए यह सिर्फ तस्वीरों का सवाल नहीं था। वह इसे दक्षिण भारतीय सिनेमा को मिलने वाली पहचान और सम्मान से जोड़कर देख रहे थे। उनके मुताबिक, साउथ की फिल्म इंडस्ट्री ने भारतीय सिनेमा को कई महान कलाकार, निर्देशक और यादगार फिल्में दी हैं।

‘रुद्रवीणा’ के लिए मिला था नेशनल अवॉर्ड

चिरंजीवी को यह सम्मान उनकी चर्चित फिल्म ‘रुद्रवीणा’ के लिए मिला था। फिल्म का निर्देशन दिग्गज फिल्ममेकर के. बालाचंदर ने किया था।

‘रुद्रवीणा’ को सामाजिक मुद्दों और मानवीय संवेदनाओं को प्रभावी तरीके से पेश करने के लिए काफी सराहना मिली थी। फिल्म में चिरंजीवी ने मुख्य भूमिका निभाई थी और उनके अभिनय को भी खूब पसंद किया गया।

फिल्म के निर्माण से चिरंजीवी के परिवार का भी जुड़ाव था। फिल्म को चिरंजीवी और उनके भाई नागेंद्र बाबू ने प्रोड्यूस किया था।

सम्मान बड़ा था, लेकिन सवाल भी रह गया

चिरंजीवी के लिए नेशनल अवॉर्ड उनके करियर की बड़ी उपलब्धियों में से एक था। लेकिन समारोह में महसूस किए गए कथित भेदभाव ने इस उपलब्धि की खुशी में एक कड़वाहट जोड़ दी।

यह घटना उस दौर की याद दिलाती है, जब हिंदी सिनेमा की तुलना में क्षेत्रीय फिल्म इंडस्ट्री को राष्ट्रीय स्तर पर उतनी प्रमुखता नहीं मिलने की शिकायतें सामने आती थीं।

आज भारतीय सिनेमा में साउथ फिल्मों की लोकप्रियता देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में बढ़ चुकी है। तेलुगु, तमिल, कन्नड़ और मलयालम सिनेमा की फिल्मों और कलाकारों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान मिल रही है।

चिरंजीवी का यह पुराना किस्सा इसी बदलाव के बीच एक महत्वपूर्ण याद के तौर पर सामने आता है। जिस कलाकार के हाथ में उस समय देश का प्रतिष्ठित फिल्म सम्मान था, वही कलाकार समारोह में अपने सिनेमा की कम मौजूदगी देखकर भीतर से आहत महसूस कर रहा था।

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