UP के ‘दो लड़कों’ की जोड़ी में आई दूरी? दिल्ली प्रदर्शन में राहुल-अखिलेश की नहीं दिखी पुरानी गर्मजोशी
दिल्ली प्रदर्शन में साथ दिखे राहुल गांधी और अखिलेश यादव, लेकिन ‘यूपी के दो लड़कों’ वाली पुरानी गर्मजोशी गायब; सपा-कांग्रेस गठबंधन को लेकर उठे सवाल

मंगलवार को दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ INDIA ब्लॉक के विरोध प्रदर्शन में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव एक साथ नजर आए, लेकिन दोनों नेताओं के बीच पहले जैसी राजनीतिक गर्मजोशी दिखाई नहीं दी। तस्वीरों और प्रदर्शन के दौरान दोनों की दूरी ने उत्तर प्रदेश में सपा-कांग्रेस गठबंधन और 2027 के विधानसभा चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
राहुल गांधी की अगुवाई में हुए इस विरोध मार्च में शामिल होने के लिए अखिलेश यादव मंगलवार सुबह दिल्ली पहुंचे थे। प्रदर्शन में दोनों नेता एक ही विपक्षी मोर्चे का हिस्सा थे, लेकिन उनकी बॉडी लैंग्वेज और आपसी संवाद में वह सहजता नजर नहीं आई, जो पहले कई मौकों पर देखने को मिल चुकी है। यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर सपा और कांग्रेस के रिश्तों को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं।
‘यूपी के लड़के’ वाली गर्मजोशी नदारद
राहुल गांधी और अखिलेश यादव की जोड़ी को 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान ‘यूपी के दो लड़के’ के तौर पर खूब प्रचार मिला था। दोनों नेताओं ने कई संयुक्त सभाओं और कार्यक्रमों में एक-दूसरे के साथ मंच साझा किया था। उस दौरान दोनों के बीच मजबूत राजनीतिक तालमेल दिखाई देता था।
हालांकि, मंगलवार के दिल्ली प्रदर्शन में तस्वीर कुछ अलग रही। दोनों नेता विरोध मार्च में साथ तो थे, लेकिन उनके बीच पहले जैसी सहज बातचीत और गर्मजोशी नजर नहीं आई। प्रदर्शन का मुख्य मुद्दा SIR और चुनाव आयोग को लेकर विपक्ष की आपत्तियां थीं, लेकिन इसी दौरान सपा-कांग्रेस के बीच संबंधों को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई।
अखिलेश की INDIA बैठक से दूरी भी बनी चर्चा का कारण
अखिलेश यादव का 30 सितंबर को दिल्ली में हुई INDIA गठबंधन की अहम बैठक में शामिल नहीं होना भी सियासी चर्चाओं का बड़ा कारण है। इसके बाद मंगलवार को विरोध प्रदर्शन में राहुल गांधी के साथ उनकी मौजूदगी के बावजूद दोनों नेताओं के बीच दूरी को राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
हालांकि, सिर्फ तस्वीरों या किसी एक कार्यक्रम के आधार पर गठबंधन में दरार की पुष्टि नहीं की जा सकती। सपा और कांग्रेस दोनों ही उत्तर प्रदेश में बीजेपी के खिलाफ विपक्षी एकजुटता बनाए रखने की जरूरत को समझते हैं। लेकिन सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों दलों के हित अलग-अलग हैं और यही आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।
सीट बंटवारे पर बढ़ सकता है दबाव
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को देखते हुए कांग्रेस संगठन को मजबूत करने की कोशिश में है, जबकि समाजवादी पार्टी राज्य में खुद को मुख्य विपक्षी ताकत मानती है। ऐसे में सीटों की संख्या को लेकर दोनों दलों की अपेक्षाओं के बीच अंतर गठबंधन के लिए चुनौती बन सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, दोनों दल फिलहाल गठबंधन की जरूरत को समझते हुए सार्वजनिक तौर पर एक-दूसरे के खिलाफ खुलकर जाने से बच रहे हैं। लेकिन चुनावी रणनीति और सीटों के बंटवारे की बातचीत जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे दबाव बढ़ना तय है।
प्रदर्शन में साथ रहे दोनों नेता
मंगलवार को INDIA ब्लॉक के प्रदर्शन में राहुल गांधी, अखिलेश यादव, प्रियंका गांधी वाड्रा, अभिषेक बनर्जी, जया बच्चन और कई अन्य विपक्षी नेता शामिल हुए। विपक्षी सांसद चुनाव आयोग के दफ्तर की ओर मार्च कर रहे थे, लेकिन पुलिस ने बैरिकेडिंग लगाकर उन्हें रोक दिया। इसके बाद कई नेता सड़क पर धरने पर बैठ गए।
राहुल गांधी बाद में आकाशवाणी भवन के पास धरने पर बैठ गए। प्रियंका गांधी भी उनके साथ धरने में शामिल हुईं। कई विपक्षी नेताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने चुनाव आयोग से मिलने और SIR को लेकर अपनी आपत्तियां रखने की मांग की।
गठबंधन की मजबूरी या वोट बैंक का दबाव?
सियासी जानकारों का मानना है कि सपा और कांग्रेस दोनों ही फिलहाल गठबंधन को कमजोर करने का जोखिम नहीं लेना चाहतीं। उत्तर प्रदेश में बीजेपी के खिलाफ विपक्षी वोटों का बिखराव रोकना दोनों दलों के लिए अहम है।
साथ ही, दोनों पार्टियों के अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक आधार हैं। समाजवादी पार्टी PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण पर जोर देती है, जबकि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपने संगठन और पारंपरिक समर्थन आधार को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
ऐसे में आने वाले महीनों में सीट बंटवारा, उम्मीदवारों का चयन और चुनावी रणनीति यह तय करेगी कि ‘दो लड़कों’ की जोड़ी 2027 में फिर उसी राजनीतिक तालमेल के साथ नजर आती है या नहीं।
फिलहाल मंगलवार की तस्वीरों ने इतना जरूर संकेत दिया है कि सपा-कांग्रेस गठबंधन में सब कुछ उतना सहज नहीं है, जितना सार्वजनिक मंचों पर दिखाई देता है। हालांकि, दोनों दल अभी भी विपक्षी एकता के मंच पर साथ खड़े हैं।



