हिंदुकुश हिमालय पर मंडरा रहा बड़ा खतरा, पिघलते ग्लेशियर से बढ़ेगी दक्षिण एशिया की चिंता
जलवायु परिवर्तन से ग्लेशियर और जलस्रोत प्रभावित, करोड़ों लोगों की जिंदगी और खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है असर

हिंदुकुश हिमालय पर मंडरा रहा जलवायु संकट, पिघलते ग्लेशियरों से दक्षिण एशिया के भविष्य पर खतरा
हिंदुकुश हिमालय केवल बर्फ से ढकी पर्वत शृंखलाओं का विस्तार नहीं है, बल्कि दक्षिण एशिया की जीवन रेखा है। अफगानिस्तान से लेकर पाकिस्तान, भारत, नेपाल और भूटान तक फैला यह विशाल पर्वतीय क्षेत्र करोड़ों लोगों के जीवन, कृषि, जलापूर्ति और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र से निकलने वाली प्रमुख नदी प्रणालियां पहाड़ों से मैदानों और आगे डेल्टा क्षेत्रों तक पानी पहुंचाती हैं। ऐसे में हिंदुकुश हिमालय में होने वाला पर्यावरणीय बदलाव पूरे दक्षिण एशिया को प्रभावित कर सकता है। Aaj Tak की रिपोर्ट
तेजी से बदल रहा है हिमालय का पर्यावरण
जलवायु परिवर्तन का असर हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र में तेजी से दिखाई दे रहा है। बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया तेज हो रही है। पहाड़ों पर बर्फ और ग्लेशियरों का संतुलन बिगड़ने से आने वाले वर्षों में नदियों के जलप्रवाह पर भी असर पड़ सकता है।
पहाड़ी इलाकों में ग्लेशियर लंबे समय से पानी के प्राकृतिक भंडार के रूप में काम करते रहे हैं। सर्दियों में जमा होने वाली बर्फ और ग्लेशियरों से निकलने वाला पानी गर्मियों में नदियों के प्रवाह को बनाए रखने में मदद करता है। लेकिन अगर ग्लेशियर लगातार तेजी से सिकुड़ते रहे तो यह प्राकृतिक जल व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
पहले बढ़ सकता है बाढ़ का खतरा
ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का असर केवल भविष्य में पानी की कमी के रूप में नहीं दिखेगा। ग्लेशियरों के पिघलने से कुछ क्षेत्रों में झीलों और जलाशयों में पानी तेजी से बढ़ सकता है। इससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी ग्लेशियल झील फटने जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है।
ऐसी स्थिति में अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर आने से पहाड़ी बस्तियों, सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है। भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा भी बढ़ सकता है।
बाद में बढ़ सकती है पानी की कमी
हिंदुकुश हिमालय के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि ग्लेशियरों के लगातार सिकुड़ने का असर लंबे समय में जल उपलब्धता पर पड़ सकता है। शुरुआत में ज्यादा बर्फ पिघलने से नदियों में पानी बढ़ सकता है, लेकिन ग्लेशियरों के आकार में लगातार कमी आने पर भविष्य में उनके पास पानी उपलब्ध कराने की क्षमता भी कम हो सकती है।
इसका सीधा असर उन इलाकों पर पड़ेगा जो पहाड़ी नदियों पर निर्भर हैं। कृषि, पीने के पानी, जलविद्युत और उद्योगों के लिए पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
करोड़ों लोगों पर पड़ेगा असर
हिंदुकुश हिमालय से निकलने वाली नदी प्रणालियां दक्षिण एशिया के विशाल मैदानी इलाकों को पानी उपलब्ध कराती हैं। सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी महत्वपूर्ण नदी प्रणालियों का संबंध इस पर्वतीय क्षेत्र से है।
इन नदियों पर करोड़ों लोगों की कृषि और रोजमर्रा की जरूरतें निर्भर हैं। इसलिए हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में होने वाला बदलाव केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और आसपास के दूसरे क्षेत्रों में भी इसके प्रभाव दिखाई दे सकते हैं।
खाद्य सुरक्षा पर भी संकट
दक्षिण एशिया में कृषि के लिए पानी की उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण है। अगर नदियों के प्रवाह में लंबे समय तक अस्थिरता आती है तो सिंचाई व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इससे फसल उत्पादन पर असर पड़ने और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां बढ़ने की आशंका है।
एक तरफ कुछ क्षेत्रों में अचानक बाढ़ और अत्यधिक बारिश फसलों को नुकसान पहुंचा सकती है, वहीं दूसरी तरफ लंबे समय में पानी की कमी खेती के लिए बड़ी समस्या बन सकती है। इस तरह जलवायु परिवर्तन कृषि क्षेत्र के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर सकता है।
जैव विविधता भी खतरे में
हिंदुकुश हिमालय दुनिया के महत्वपूर्ण जैव विविधता वाले क्षेत्रों में शामिल है। यहां अलग-अलग तरह के वन, वन्यजीव और दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं। तापमान और वर्षा के पैटर्न में बदलाव से इनके प्राकृतिक आवास प्रभावित हो सकते हैं।
पेड़-पौधों और वन्यजीवों को बदलती जलवायु के अनुरूप अपने आवास बदलने पड़ सकते हैं। जो प्रजातियां तेजी से बदलते पर्यावरण के साथ तालमेल नहीं बिठा पाएंगी, उनके अस्तित्व पर खतरा बढ़ सकता है।
सीमा पार सहयोग जरूरी
हिंदुकुश हिमालय कई देशों में फैला हुआ है और इसकी नदी प्रणालियां भी राष्ट्रीय सीमाओं से आगे जाती हैं। इसलिए किसी एक देश के स्तर पर किए गए प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे।
ग्लेशियरों की निगरानी, जल संसाधनों के प्रबंधन, आपदा की पूर्व चेतावनी और नदी के पानी से जुड़े आंकड़ों को साझा करने के लिए क्षेत्रीय सहयोग की जरूरत होगी। भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान और अफगानिस्तान जैसे देशों के बीच वैज्ञानिक और पर्यावरणीय सहयोग भविष्य के जोखिमों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
अभी से उठाने होंगे कदम
हिंदुकुश हिमालय में होने वाले बदलाव को केवल पर्यावरण की समस्या मानना पर्याप्त नहीं है। यह पानी, कृषि, ऊर्जा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ा मुद्दा है।
ग्लोबल वार्मिंग को सीमित करने के लिए उत्सर्जन में कमी के साथ-साथ ग्लेशियरों और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की लगातार निगरानी जरूरी है। संवेदनशील इलाकों में शुरुआती चेतावनी प्रणाली मजबूत करनी होगी और बाढ़, भूस्खलन तथा ग्लेशियल झीलों से जुड़े जोखिमों के लिए स्थानीय स्तर पर तैयारी बढ़ानी होगी।
हिंदुकुश हिमालय का संरक्षण इसलिए सिर्फ पहाड़ों को बचाने की कोशिश नहीं है। यह दक्षिण एशिया की नदियों, खेतों, जंगलों और आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी की सुरक्षा से जुड़ा सवाल है। पूरी रिपोर्ट पढ़ें
