Chambal Dolphin Census 2026: चंबल नदी में डॉल्फिन की गिनती शुरू, 3 राज्यों में आधुनिक तकनीक से होगा सर्वेक्षण
चंबल नदी में रिवर डॉल्फिन यानी सूंस की गणना के लिए तीन राज्यों में विशेष अभियान, आधुनिक तकनीक से पता चलेगी इनकी संख्या

Chambal Dolphin Census 2026: चंबल नदी में डॉल्फिन की गिनती, 3 राज्यों में आधुनिक तकनीक से होगा सर्वेक्षण
चंबल नदी में पाई जाने वाली रिवर डॉल्फिन यानी सूंस के संरक्षण की दिशा में विशेष पहल की जा रही है। वर्ष 2026 की गणना के तहत चंबल नदी में डॉल्फिन की संख्या और उनके प्राकृतिक आवास की स्थिति का आकलन करने के लिए आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस अभियान में राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से जुड़े नदी क्षेत्रों पर ध्यान दिया जा रहा है।
नदी की सतह पर कुछ पल के लिए दिखाई देने वाली सूंस को गिनना आसान नहीं होता। कई बार डॉल्फिन पानी से बाहर आती है और कुछ ही क्षणों में फिर गहराई में चली जाती है। इसी वजह से इनकी वास्तविक संख्या का अनुमान लगाने के लिए विशेषज्ञों को व्यवस्थित सर्वेक्षण करना पड़ता है।
तीन राज्यों की टीमें कर रहीं सर्वेक्षण
इस अभियान में राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के वन विभागों के कर्मचारी शामिल हैं। इनके साथ देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के 15 विशेषज्ञ भी काम कर रहे हैं। सर्वे शुरू होने से पहले वनकर्मियों को धौलपुर के देवरी घड़ियाल केंद्र में विशेष प्रशिक्षण दिया गया, ताकि वे वैज्ञानिक तरीके से जलीय जीवों की पहचान और गणना कर सकें।
फरवरी में मिली थीं 155 डॉल्फिन
धौलपुर के वन विभाग के अनुसार, फरवरी 2026 में हुई जलीय जीव गणना के दौरान चंबल के 435 किलोमीटर लंबे संरक्षित क्षेत्र में 155 रिवर डॉल्फिन दर्ज की गई थीं। अब नए सर्वेक्षण के जरिए उनकी संख्या का दोबारा आकलन किया जा रहा है।
गणना के आंकड़ों में अंतर होने का मतलब यह जरूरी नहीं कि डॉल्फिन की आबादी उतनी ही घट या बढ़ गई हो। सामान्य गणना में पानी की सतह पर दिखाई देने वाले जीव दर्ज हो सकते हैं, जबकि विशेष सर्वेक्षण में दूसरी वैज्ञानिक विधियों का इस्तेमाल किया जाता है।
अल्ट्रासोनिक तकनीक से पानी के भीतर तलाश
रिवर डॉल्फिन की गिनती में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह कुछ ही सेकंड के लिए पानी की सतह पर दिखाई देती है। इसके बाद फिर गहराई में चली जाती है। इस बार विशेषज्ञ आधुनिक उपकरणों और अल्ट्रासोनिक तरंगों पर आधारित तकनीक की मदद से पानी के भीतर उसकी मौजूदगी का पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं।
गंगा डॉल्फिन की देखने की क्षमता कमजोर होती है। वह पानी में दिशा पहचानने और आसपास की वस्तुओं का पता लगाने के लिए ध्वनि तरंगों का इस्तेमाल करती है। वैज्ञानिक इसी विशेषता से जुड़ी तकनीक के जरिए उसके व्यवहार और मौजूदगी को समझने की कोशिश कर रहे हैं।
डॉल्फिन संरक्षण के लिए क्यों जरूरी है गणना?
डॉल्फिन की संख्या और उनके रहने के क्षेत्रों की जानकारी मिलने से संरक्षण की योजनाएं बनाने में मदद मिल सकती है। इससे विशेषज्ञ उन नदी क्षेत्रों की पहचान कर सकते हैं, जहां इनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने की ज्यादा जरूरत है।
चंबल नदी का पारिस्थितिकी तंत्र घड़ियाल, मगरमच्छ, कछुओं और कई अन्य जलीय जीवों के लिए भी महत्वपूर्ण है। ऐसे में नियमित सर्वेक्षण से नदी की जैव विविधता को समझने और उसके संरक्षण के प्रयासों को दिशा देने में मदद मिल सकती है।
निष्कर्ष: चंबल नदी में रिवर डॉल्फिन की नई गणना के लिए तीन राज्यों के वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञ मिलकर काम कर रहे हैं। आधुनिक तकनीक से किए जा रहे इस सर्वेक्षण का उद्देश्य सूंस की आबादी का अधिक सटीक आकलन करना और उसके संरक्षण के लिए उपयोगी जानकारी जुटाना है। अंतिम आंकड़े सामने आने के बाद ही पता चलेगा कि चंबल में डॉल्फिन की संख्या में क्या बदलाव आया है।
