103 नक्सलियों का आत्मसमर्पण – क्या बस्तर में बदल रहा है समीकरण?*
*103 नक्सलियों का आत्मसमर्पण – क्या बस्तर में बदल रहा है समीकरण?*
छत्तीसगढ़ के बीजापुर में दशहरे के दिन हुआ 103 नक्सलियों का आत्मसमर्पण केवल एक सांख्यिकीय घटना नहीं है। यह उस लंबे संघर्ष का संकेत है जो राज्य और केंद्र सरकार वर्षों से जंगलों में लड़ रही हैं। यह घटना कई स्तरों पर विचार करने योग्य है – राजनीतिक, सामाजिक और रणनीतिक।
*यह आत्मसमर्पण क्यों महत्वपूर्ण है?*
नक्सलवाद के इतिहास में कभी-कभार ही इतने बड़े पैमाने पर नक्सलियों ने हथियार छोड़े हैं। इनमें से लगभग आधे पर इनाम घोषित था। इसका सीधा अर्थ है कि संगठन के भीतर से नेतृत्व और रणनीति दोनों पर गंभीर चोट लगी है। यह माओवादी संगठन की मनोवैज्ञानिक हार भी मानी जाएगी।
*सरकार की नीति का असर*
छत्तीसगढ़ की मौजूदा सरकार ने “नियद नेल्लानार योजना” और आत्मसमर्पण-पुनर्वास पैकेज पर विशेष ध्यान दिया। पहले नक्सलियों को केवल सैन्य दबाव से काबू करने की कोशिश होती थी, लेकिन अब विकास, संवाद और सुरक्षा का संयुक्त मॉडल अपनाया गया है। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को प्रोत्साहन राशि, रोज़गार और सामाजिक पुनर्वास की गारंटी दी गई।
यह इस बात का संकेत है कि केवल बंदूक से नहीं, बल्कि विश्वास और अवसर से भी युद्ध जीते जा सकते हैं।
*सामाजिक निहितार्थ*
बस्तर में दशकों से नक्सलवाद ने विकास की गति रोक दी थी। सड़क, स्कूल, अस्पताल और रोज़गार सब प्रभावित हुए। जब कोई नक्सली हथियार छोड़ता है तो उसके साथ पूरा परिवार और गाँव भी राहत महसूस करता है।
यह आत्मसमर्पण उन ग्रामीणों के लिए उम्मीद की किरण है जो लंबे समय से दो पाटों – पुलिस और नक्सलियों – के बीच पिस रहे थे।
**चुनौतियाँ अभी बाकी हैं
लेकिन तस्वीर पूरी तरह साफ़ नहीं है।**
• जंगलों में अब भी सक्रिय सशस्त्र दस्ते हैं जो आत्मसमर्पण नहीं करना चाहते।
• आत्मसमर्पण करने वालों का वास्तविक पुनर्वास करना आसान नहीं होगा। यदि उन्हें रोज़गार, शिक्षा और सामाजिक स्वीकार्यता नहीं मिली, तो यह लोग दोबारा जंगल का रास्ता भी पकड़ सकते हैं।
• नक्सली संगठन अक्सर “मुखबिर” बताकर ग्रामीणों की हत्या करते हैं। इसी घटना वाले दिन एक ग्रामीण की हत्या इसी वजह से की गई। यह दर्शाता है कि हिंसा की जड़ें अभी पूरी तरह सूखी नहीं हैं।
राजनीतिक प्रभाव
राज्य सरकार इस घटना को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रचारित करेगी। यह 2028 तक चलने वाले विधानसभा कार्यकाल में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के लिए एक मजबूत उपलब्धि है। दूसरी ओर, विपक्ष सवाल उठाएगा कि क्या यह केवल चुनावी रणनीति है या वास्तव में स्थायी समाधान की दिशा में कदम।
राष्ट्रीय सुरक्षा पर असर
नक्सलवाद को भारत की “आंतरिक सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती” कहा गया है। यदि बीजापुर मॉडल सफल होता है, तो यह झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र जैसे अन्य नक्सल प्रभावित राज्यों में भी अपनाया जा सकता है। यह भारत की सुरक्षा रणनीति को “सिर्फ बंदूक” से “बंदूक + विकास + संवाद” की ओर मोड़ देगा।
इतने नक्सलियों का आत्मसमर्पण निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है, लेकिन यह अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। असली परीक्षा अब सरकार और समाज की है—क्या वे इन लोगों को भरोसा दिला पाएँगे कि बंदूक छोड़ने का फ़ैसला सही था? यदि हाँ, तो आने वाले वर्षों में बस्तर सचमुच शांति और विकास की धरती बन सकता है।
( राजीव खरे ब्यूरो चीफ छत्तीसगढ़)
