हाइवे बने अखाड़ा – रसूखदार के बेटे का पहिया, जनता की जान का तकिया”
हाइवे बने अखाड़ा – रसूखदार के बेटे का पहिया, जनता की जान का तकिया
बिलासपुर हाईकोर्ट ने हाल ही में फरमान सुनाया – “स्टंट अगर सड़क पर होगा, तो गाड़ी सीधी थाने में होगी।” सुनने में कड़ा आदेश है, पर हकीकत यह है कि हमारे हाइवे और चौराहे कब से “स्टंट शो रूम” बन चुके हैं। फर्क बस इतना है कि टिकट ब्लैक में नहीं बिकता, बल्कि ट्रैफिक जाम और हॉर्न की आवाज़ के बीच मुफ़्त में हर आम आदमी को शो देखना पड़ता है।
ये तमाम करतबबाज ज्यादातर “रसूखदाों के लाड़ले” निकलते हैं। उनके लिए सड़क पर चल रही जनता किसी “एडजस्टेबल स्पीड-ब्रेकर” से ज़्यादा नहीं होती। एक ओर गाड़ी का हैंडल, दूसरी ओर रसूख का हैंडल – दोनों कसकर पकड़ लो, फिर कौन रोक सकता है?
हज़ारीप्रसाद द्विवेदी जी ने कभी लिखा था – “रसूख की गाड़ी चारों ओर से धक्का ही खाती है, पर आगे ही बढ़ती जाती है।” आज ये बात हूबहू इन स्टंटबाजों पर लागू होती है। पुलिस तभी एक्शन में आती है जब हाईकोर्ट डंडा दिखा दे। वरना तो थाने में गाड़ी पहुँचने से पहले ही “फ़ोन कॉल” पहुँच जाता है।
हरिशंकर परसाई ने कहा था – “हमारे यहाँ नियम भी वैसे ही चलते हैं जैसे बिजली – अमीरों के यहाँ कभी कटती नहीं।” यही हाल इन स्टंटबाजों का है। आम लड़के का बाइक पकड़ा जाए तो उसका चालान पूरा परिवार भरता है। लेकिन रसूखदार का बेटा अगर हवा में उड़ते-घूमते ‘विली’ करता पकड़ा जाए तो पुलिस का चालान नहीं, सिर्फ़ ‘सलाम’ निकलता है।
दरअसल, हाइवे अब “जनता के लिए मार्ग” नहीं, बल्कि “जवानी का जिमख़ाना” बन चुके हैं। आम आदमी सोचता है कि कभी अपनी गाड़ी सही सलामत घर पहुँचेगी या “स्टंट रॉकेट” से टकराकर सड़क किनारे पार्क हो जाएगी।
नतीजा यह है कि जनता को स्टंट देखने का सौभाग्य तो मिल जाता है, पर कभी-कभी टिकट की क़ीमत हड्डी के प्लास्टर या आईसीयू का बिल बन जाती है।
व्यंग्य यही है कि अदालतों को आदेश देना पड़ रहा है कि “सड़कें चलने के लिए हैं, मौत के शो करने के लिए नहीं।” लेकिन हकीकत में ये आदेश भी उतने ही असरदार हैं जितना लाल बत्ती पर लिखा – ‘रुको’ किसी रसूखदार की गाड़ी के लिए होता है।
( राजीव खरे- गाड़ियों के स्टंट से बचने की जुगत में )
