Indus Waters Treaty: UNSC को पाकिस्तान की चिट्ठी पर भारत का कड़ा जवाब, आर्बिट्रेशन कोर्ट के फैसले को बताया अमान्य
UN में पाकिस्तान की शिकायत पर भारत का पलटवार, सिंधु जल संधि और आर्बिट्रेशन कोर्ट के अधिकार पर उठाए सवाल

# Indus Waters Treaty: UNSC को पाकिस्तान की चिट्ठी पर भारत का कड़ा जवाब, आर्बिट्रेशन कोर्ट के फैसले को बताया अमान्य
**नई दिल्ली:** सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र तक पहुंच गया है। पाकिस्तान की ओर से हाल ही में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) को एक पत्र भेजकर सिंधु जल संधि पर कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के हालिया फैसले का मुद्दा उठाया गया। भारत ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए पाकिस्तान पर तथ्यों को गलत तरीके से पेश करने का आरोप लगाया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत इस मामले में अपनी स्थिति पहले ही स्पष्ट कर चुका है और वह उस कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं करता।
## पाकिस्तान के UNSC पत्र पर भारत का जवाब
विदेश मंत्रालय की साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में रणधीर जायसवाल ने पाकिस्तान की ओर से UNSC को भेजे गए पत्र पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान सिंधु जल संधि से जुड़े मामले में तथ्यों को गलत तरीके से पेश कर रहा है।
भारत का कहना है कि पाकिस्तान जिस फैसले को स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (Permanent Court of Arbitration) का फैसला बता रहा है, वह भारत की नजर में ऐसे न्यायिक निकाय का फैसला है, जिसे सिंधु जल संधि के अनुरूप वैध तरीके से गठित नहीं किया गया था। भारत ने इसी आधार पर इस प्रक्रिया में हिस्सा लेने से भी इनकार किया है।
## 31 अगस्त को आया था कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन का फैसला
31 अगस्त 2026 को PCA ने सिंधु जल संधि से जुड़े मामले में एक अवॉर्ड जारी किया था। PCA के अनुसार, कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने सिंधु जल संधि की स्थिति पर फैसला और जम्मू-कश्मीर स्थित रतले हाइड्रो-इलेक्ट्रिक प्लांट से संबंधित अंतरिम उपायों पर आदेश जारी किया।
अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता प्रक्रिया से जुड़े फैसले में कहा गया कि सिंधु जल संधि प्रभावी बनी हुई है और भारत इसे एकतरफा तरीके से स्थगित या निष्क्रिय नहीं कर सकता। रतले परियोजना के निर्माण से जुड़े कुछ पहलुओं पर भी अंतरिम प्रतिबंध लगाए गए।
हालांकि, भारत ने इस फैसले को स्वीकार नहीं किया। नई दिल्ली का तर्क है कि जिस कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने यह फैसला दिया, उसके पास भारत के संप्रभु फैसले पर अधिकार क्षेत्र नहीं है। भारत ने यह भी कहा है कि वह इस मध्यस्थता प्रक्रिया में शामिल नहीं हुआ है।
## भारत क्यों नहीं मानता कोर्ट का फैसला?
भारत लंबे समय से इस मामले में दो अलग-अलग विवाद समाधान प्रक्रियाओं को लेकर आपत्ति जताता रहा है। नई दिल्ली के मुताबिक, पाकिस्तान द्वारा शुरू की गई मध्यस्थता प्रक्रिया को भारत सिंधु जल संधि की व्यवस्था के अनुरूप स्वीकार नहीं करता।
भारत का कहना है कि जिस कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने फैसला दिया, उसका गठन संधि की शर्तों के अनुरूप नहीं हुआ। इसी वजह से भारत ने इस प्रक्रिया में भाग नहीं लिया और उसके फैसले को अपने लिए बाध्यकारी नहीं माना।
दूसरी ओर, PCA के आधिकारिक रिकॉर्ड में इस मामले को पाकिस्तान बनाम भारत के रूप में दर्ज किया गया है और 31 अगस्त 2026 को जारी प्रेस रिलीज में कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के अवॉर्ड का उल्लेख किया गया है।
## क्या है सिंधु जल संधि?
सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुई जल-वितरण व्यवस्था है। विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई इस संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के अधिकार और जिम्मेदारियां तय की गई थीं।
संधि के तहत **रावी, ब्यास और सतलुज** नदियों के पानी के इस्तेमाल का मुख्य अधिकार भारत को मिला, जबकि **सिंधु, झेलम और चिनाब** नदियों के पानी का इस्तेमाल मुख्य रूप से पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया गया। हालांकि, पश्चिमी नदियों पर भारत को भी संधि के तहत कुछ निर्धारित उपयोगों, विशेष रूप से जलविद्युत परियोजनाओं, की अनुमति है।
इसी वजह से जम्मू-कश्मीर में भारत की जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से विवाद रहा है।
## पहलगाम हमले के बाद भारत ने संधि को किया था स्थगित
अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का ऐलान किया था। इस हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी।
भारत ने इसके बाद कहा था कि संधि तब तक स्थगित रहेगी, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को लेकर विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय कार्रवाई नहीं करता। पाकिस्तान ने भारत के इस कदम को चुनौती दी और सिंधु जल संधि से जुड़े विवाद को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया।
## रतले परियोजना भी विवाद के केंद्र में
सिंधु जल संधि विवाद में जम्मू-कश्मीर की **रतले हाइड्रो-इलेक्ट्रिक परियोजना** भी प्रमुख मुद्दा है। पाकिस्तान ने इस परियोजना के डिजाइन और निर्माण से जुड़े कुछ पहलुओं पर आपत्ति जताई थी।
31 अगस्त के अवॉर्ड में कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने रतले परियोजना को लेकर अंतरिम उपायों से संबंधित आदेश भी दिया था। PCA के मुताबिक, कुछ निर्माण गतिविधियों पर अस्थायी सीमाएं लागू की गईं और परियोजना के संधि-अनुपालन से जुड़े पहलुओं की जांच के लिए तटस्थ विशेषज्ञ की प्रक्रिया का भी उल्लेख किया गया।
भारत हालांकि इस आदेश को अपने ऊपर लागू नहीं मानता और उसका कहना है कि कोर्ट को भारत की संप्रभु परियोजनाओं के संबंध में फैसला देने का अधिकार नहीं है।
## भारत ने आतंकवाद के मुद्दे को भी जोड़ा
रणधीर जायसवाल ने सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान के रुख के जवाब में सीमा पार आतंकवाद का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को केवल बयान देने के बजाय सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ विश्वसनीय कार्रवाई और ठोस प्रतिबद्धता दिखानी होगी।
इससे साफ है कि भारत सिंधु जल संधि के मुद्दे को केवल पानी के बंटवारे से जुड़े तकनीकी विवाद के रूप में नहीं देख रहा, बल्कि इसे व्यापक भारत-पाकिस्तान संबंधों के संदर्भ में रख रहा है।
## आगे क्या होगा?
UNSC को पाकिस्तान की चिट्ठी भेजे जाने और भारत की प्रतिक्रिया के बाद सिंधु जल संधि का मुद्दा एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक चर्चा में है। पाकिस्तान कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के फैसले को अपने पक्ष में रख रहा है, जबकि भारत उसके अधिकार क्षेत्र और फैसले की वैधता को स्वीकार नहीं करता।
फिलहाल दोनों देशों की स्थिति में कोई बदलाव दिखाई नहीं देता। भारत संधि को अप्रैल 2025 से स्थगित रखने के अपने फैसले पर कायम है, जबकि पाकिस्तान संधि को लागू रखने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने पक्ष को उठाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में सिंधु जल संधि का विवाद आने वाले समय में भारत-पाकिस्तान संबंधों और क्षेत्रीय जल कूटनीति का एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना रह सकता है।



