प्रदेश-भारत का बढा सम्मान विश्व में राष्ट्रभक्त संत कर्मयोगी प्रकृति पुत्र त्यागी जी की त्याग-तपस्या से (भारत यात्रा ) बुराई खत्म करने नही अच्छाई की जाग्रति से मानव मे स्थाई रहेगी पवित्रता जगेगी देशभक्ति
नर से नारायण की यात्रा हर घर हर मानव यही मानवता का लक्ष्य है हम सब धरती पर आने के कारण को जाने हम सबका जन्म ही मानवता को जाग्रत करने हुआ है सोई हुई मानवता ही दैत्यों को तैयार करती है हमारे अंदर ही राक्षस का जन्म हो जाता है हमे बहुत देर से पता चल पाता है जब कुछ नहीं होता हाथ।
राष्ट्रभक्त संत कर्मयोगी प्रकृति पुत्र त्यागी जी का जन्म कटनी जिले में धरती छोटे से गांव विलायत कला के निवासी हैं आप ।
आपकी जन्म भूमि,कर्मभूमि,तपोभूमि आज बन गयी है दुनिया की सबसे पवित्र ज्ञान तीर्थ भूमि यह हुआ है त्यागी जी को मिली ईश्वर की कृपा से। प्
माता पिता के संस्कार सूर्य देव के साक्षात्कार ने बनाया पंडित वीरेन्द्र तिवारी जी को मातृभूमि का सच्चा बच्चा जिन्हे आज देश विदेश दुनिया में कर्मयोगी प्रकृति पुत्र त्यागी जी के नाम से जानते हैं सभी पवित्र जन।
जन्म भूमि के लिए इतना समर्पित भाव भारत के संतो मे ही संभव है वह भी मध्य प्रदेश की पावन धरती का कटनी जिला आज धन्य हो रहा है भारत मे सच्चे साधकों की कमी नहीं है यह तो सबको पता है लेकिन महानदी मैया की गोद मे पल रहे एक नन्हा सा बच्चा अपनी जन्म भूमि का मान दुनिया में बढायेगा वह भी बिना जादूगरी,बिना आडंबर-पाखंड और कुरीतियो के बेवजह बनी परंपराओ से निजात
सच्चे लेकिन कठिन त्याग से वह भी देशभक्ति का जज़्बा लिये मातृभूमि की सेवा के लिए समर्पित राष्ट्र रक्षा विश्व कल्याण की भावना लोक मंगल ही परम लक्ष्य है जिनका वो और कोई नही वे है जल की तरह तरल, सरल और निर्मल आपके द्वारा समाज में एक नयी चेतना दौड़ रही है।
संस्कारों की बगिया सजाने हर बच्चे मे सच्चे धर्म को स्थापित करने भारत का मान दुनिया मे बढ़ाने पवित्र पीढ़ी तैयार कर रहे भोजन शिक्षा संस्कार अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का साहस पैदा कर रहे हैं
नौकर बनने नही देश का सच्चा सिपाही बनाने जो अपने हर कार्य को प्रेम समर्पण और सेवा से भर कर करे वह भी बिना अहसान परोसे जो भी कर्म करे उसे कर्तव्य समझते हुए जिसका प्रभाव समाज पर पङेगा ही।
प्रकृति के लिए समर्पित प्रकृति पुत्र त्यागी जी हर उस कार्य को करते है जिससे समाज का पवित्र निर्माण हो। चोरी को भरष्टाचार को रोजगार न मान लिया जाये गीता मे लिखे विकर्म -अकर्म को भी कर्म न कहा जाये कर्म तो ईश्वर की सच्ची संतान होने का गौरव देता है अहंकारी नही परोपकारी बनाता है सोच और सच में ही जिसे पवित्रता दिखे जिसे अपने हित को छोङ परमार्थ की सदा लालसा हो वही न्यायसंगत कार्य करेंगे जीवों के प्रति प्रेम जगेगा।
आवश्यकताओं की पूर्ति में आशक्ति ठीक नहीं सीमित जरूरतों पर रहकर ही ईमानदार रहा जा सकता है
त्याग तपस्या बलिदान की परिभाषा को ही समझना होगा
त्याग लोभ का मोह का विकारों का बंधन का अपने लिये सुख साधन जुटाने से निवृत्ति का
कुछ भी नही पाने का नाम ही त्याग है और त्याग के बदले बिना चाहे ही परमात्मा देते ही है वह ईश्वर का प्रसाद है चूंकि हर बीज मे विशाल वृक्ष है हममें भी आपमें भी कोई माने या न माने ।
तपस्या से खुद को तपाकर परमात्मा की याद में स्वयं को न्योछावर कर खुद के लिए कुछ नहीं सब कुछ परमात्मा का परमात्मा को अर्पित समर्पित खुद भूखे रह भी दूसरो को भोजन कराना खुद फटे कपड़े पहन कर भी सबके लिए अच्छा देने का संकल्प रखना ही तपस्या के लक्ष्य
बलिदान अपनी फालतू इच्छाओ का वासनाओ का पदार्थो की चाह का बलिदान साहस का सामर्थ्य का सम्मान का इस तरह त्याग तपस्या बलिदान को समझे बिना भेद समाज के जङ चेतन मे प्रेम ऊंचा नीचा छोटा बङा सबमें परमात्मा को ही देखना जहर अमृत सबमें ईश्वर का संदेश भरा है।ऐसी विचारधारा के धनी विचारों से समृद्ध आचरण से धनवान संस्कृति के प्रेम से भरे है राष्ट्रभक्त संत कर्मयोगी प्रकृति पुत्र त्यागी जी जिनकी मधुर मुस्कान सहयोगी विचारधारा जो कि ईश्वर से सच्ची संतान होने का संकेत भी देती है और गौरव भी प्रदान करती है जिनका कौई शत्रु- मित्र नहीं कोई पराया नही सब अपने बिलकुल उसी तरह जैसे समुद्र के जल में जहर और अमृत मिलकर भी पवित्र जल ही रहता है बिना रंग, जाति ,धर्म सबमें परमात्मा है तो हम भेद करने वाले कौन जब सब कुछ परम सत्ता ने बनाया तो हम उगली उठाने वाले कौन क्या अधिकार है हमे हम किसी को चोट पहुंचाये बल्कि औषधीय गुण हो हमारे जिससे मिले उसके अंदर एक आनंद उमङे उल्लास पैदा हो संकुचित मानसिकता आपको नष्ट करने मे ही सहायक होगी ।
ऐसी पवित्र भावना के धनी है भारत के सच्चे संत सच्चे बच्चे जो सूर्य की भांति सकारात्मक ऊर्जा से कोने कोने में अपना प्रकाश अपनी ऊर्जा पहुंचाने फिर चाहे वह विद्यालय हो ,कालेज हो या धर्म स्थल तीर्थ, कारखाना हो या कार्यालय हर जगह अग्नि परीक्षा देकर भी शंखनाद करते हुए अपनी जन्म भूमि को विश्व पटल पर कर चुके हैं स्थापित।
आओ जगे जगाये देव भूमि भारत की शान बढाये सब अपनी जन्म भूमि को तीर्थ बनाये सच्चा स्वर्ग सजाये l


