
# पुरानी डीजल गाड़ियों के प्रदूषण पर लगेगी लगाम, ₹4,000 की RECD तकनीक से मिलेगी बड़ी राहत
**नई दिल्ली।** पुरानी डीजल गाड़ियों से निकलने वाला धुआं अब प्रदूषण की समस्या को और गंभीर बनाने के बजाय तकनीक की मदद से काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकेगा। पुरानी कमर्शियल डीजल गाड़ियों को कबाड़ में भेजने के बजाय उनमें एक खास डिवाइस लगाकर उनके उत्सर्जन को कम करने की तैयारी की जा रही है। इस तकनीक को **रेट्रोफिट एमिशन कंट्रोल डिवाइस (RECD)** नाम दिया गया है।
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने पुरानी डीजल गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए इस तकनीक के इस्तेमाल की दिशा में पहल की है। इस परियोजना में **IIT दिल्ली** की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसका उद्देश्य ऐसी पुरानी डीजल गाड़ियों के प्रदूषण को नियंत्रित करना है, जिन्हें केवल उम्र या उत्सर्जन के कारण तुरंत स्क्रैप करना व्यावहारिक नहीं है।
## क्या है RECD तकनीक?
**रेट्रोफिट एमिशन कंट्रोल डिवाइस (RECD)** को आसान भाषा में गाड़ी के एग्जॉस्ट सिस्टम के पास लगाया जाने वाला एक तरह का प्रदूषण नियंत्रण फिल्टर समझा जा सकता है। यह डीजल इंजन से निकलने वाले धुएं में मौजूद हानिकारक कणों और प्रदूषकों को कम करने में मदद करता है।
इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि पुरानी डीजल गाड़ी को पूरी तरह बदलने के बजाय उसमें डिवाइस लगाकर उसके उत्सर्जन को नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है। यानी वाहन मालिकों को तुरंत नई गाड़ी खरीदने का बड़ा खर्च उठाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
## सिर्फ करीब ₹4,000 में हो सकता है समाधान
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसकी संभावित कम लागत है। जानकारी के मुताबिक, RECD की कीमत करीब **₹4,000** बताई जा रही है। इसके मुकाबले किसी पुरानी कमर्शियल डीजल गाड़ी को बेचकर नई गाड़ी खरीदना वाहन मालिक के लिए लाखों रुपये का खर्च हो सकता है।
ऐसे में अगर यह तकनीक बड़े स्तर पर लागू होती है और तय मानकों पर खरी उतरती है, तो इससे छोटे कारोबारियों, ट्रांसपोर्टरों और पुराने कमर्शियल वाहनों के मालिकों को आर्थिक राहत मिल सकती है।
## कबाड़ में भेजने के बजाय पुरानी गाड़ी में लगेगी नई तकनीक
पुरानी डीजल गाड़ियों को लेकर देश के कई हिस्सों में प्रदूषण और वाहन की उम्र को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। ऐसे में सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती यह भी है कि प्रदूषण कम करने के साथ-साथ वाहन मालिकों पर अचानक नए वाहन खरीदने का आर्थिक बोझ न पड़े।
RECD जैसी रेट्रोफिट तकनीक इसी समस्या का एक संभावित समाधान मानी जा रही है। इसके जरिए पुराने वाहन के इंजन और वाहन को पूरी तरह बदलने के बजाय उसके एग्जॉस्ट से निकलने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने पर ध्यान दिया जाता है।
## डीजल जनरेटर में पहले से इस्तेमाल होती रही है ऐसी तकनीक
रेट्रोफिट एमिशन कंट्रोल की अवधारणा पूरी तरह नई नहीं है। इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल डीजल जनरेटरों में पहले से किया जाता रहा है। अब इसी तरह की तकनीक को वाहनों के लिए विकसित और अनुकूलित किया जा रहा है।
IIT दिल्ली की विशेषज्ञता का इस्तेमाल इस तकनीक को वाहनों के लिए प्रभावी बनाने और इसके प्रदर्शन का आकलन करने में किया जा रहा है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि डिवाइस लगाने के बाद वाहन के उत्सर्जन में वास्तविक कमी आए और वह निर्धारित मानकों के अनुरूप हो।
## मंत्रालय तय करेगा नियम
RECD तकनीक को वाहनों में व्यापक स्तर पर इस्तेमाल करने से पहले इसके लिए जरूरी नियम और तकनीकी मानक तय किए जाने हैं। सड़क परिवहन मंत्रालय इस दिशा में नियम तैयार करने की प्रक्रिया में जुटा है।
सरकार के सामने यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा कि बाजार में उपलब्ध डिवाइस निर्धारित गुणवत्ता और उत्सर्जन नियंत्रण मानकों को पूरा करें। इसके साथ ही डिवाइस की फिटिंग, जांच और समय-समय पर इसके प्रदर्शन की निगरानी के लिए भी स्पष्ट व्यवस्था की जरूरत होगी।
## प्रदूषण कम करने में क्यों महत्वपूर्ण है RECD?
पुराने डीजल वाहनों से निकलने वाला धुआं हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले प्रदूषक कणों का एक स्रोत है। खासतौर पर बड़े शहरों में पुराने कमर्शियल वाहनों की संख्या और उनके उत्सर्जन को नियंत्रित करना प्रदूषण प्रबंधन की बड़ी चुनौती है।
अगर RECD तकनीक प्रभावी साबित होती है, तो पुराने डीजल वाहनों के उत्सर्जन को कम करने में मदद मिल सकती है। इससे एक तरफ प्रदूषण नियंत्रण की कोशिश को मजबूती मिलेगी, वहीं दूसरी तरफ वाहन मालिकों को पुराने वाहन को तुरंत बदलने की मजबूरी से राहत मिल सकती है।
## वाहन मालिकों को क्या फायदा होगा?
इस तकनीक का सबसे सीधा फायदा उन लोगों को हो सकता है जिनके पास पुराने डीजल कमर्शियल वाहन हैं। नई गाड़ी खरीदने के लिए बड़ी रकम खर्च करने के बजाय अपेक्षाकृत कम लागत वाले रेट्रोफिट डिवाइस का विकल्प मिल सकता है।
हालांकि, यह तभी संभव होगा जब सरकार इसके इस्तेमाल को आधिकारिक रूप से मंजूरी दे और संबंधित वाहनों के लिए स्पष्ट नियम जारी करे। साथ ही, अलग-अलग इंजन और वाहन मॉडल पर इसकी प्रभावशीलता की जांच भी जरूरी होगी।
## आगे क्या होगा?
फिलहाल RECD तकनीक को लेकर सरकार और तकनीकी संस्थानों के स्तर पर काम आगे बढ़ाया जा रहा है। मंत्रालय द्वारा इसके लिए नियम और मानक तय किए जाने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि किन वाहनों में इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा और इसे किस तरह अनिवार्य या वैकल्पिक बनाया जाएगा।
अगर यह पहल सफल रहती है तो पुरानी डीजल गाड़ियों को लेकर प्रदूषण नियंत्रण और वाहन मालिकों की आर्थिक परेशानी—दोनों के बीच संतुलन बनाने में मदद मिल सकती है। खासतौर पर कमर्शियल वाहन क्षेत्र में यह तकनीक एक कम लागत वाले विकल्प के रूप में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
**निष्कर्ष:**
पुरानी डीजल गाड़ियों को सीधे कबाड़ में भेजने के बजाय **RECD तकनीक** के जरिए उनके प्रदूषण को कम करने की पहल पर्यावरण और वाहन मालिकों, दोनों के लिए अहम हो सकती है। करीब ₹4,000 की संभावित लागत वाली यह तकनीक अगर सरकारी मानकों पर खरी उतरती है, तो भविष्य में पुराने डीजल वाहनों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने का एक सस्ता और व्यावहारिक विकल्प बन सकती है।



