Rajasthan Police Blunder: मृत व्यक्ति के वारंट पर लखनऊ में तैनात अखिलेश त्रिपाठी गिरफ्तार, 166 दिन बाद रिहाई
राजस्थान पुलिस ने 26 साल पहले मर चुके व्यक्ति के खिलाफ जारी गिरफ्तारी वारंट पर लखनऊ में तैनात अखिलेश त्रिपाठी को गिरफ्तार कर लिया। नाम की गलत पहचान के चलते वह 166 दिन तक जेल में रहा, बाद में सच्चाई सामने आने पर रिहा किया गया।

राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले से पुलिस की बड़ी लापरवाही का मामला सामने आया है। गंगापुर सिटी सदर थाना पुलिस ने करीब 26 साल पहले मर चुके एक व्यक्ति के नाम से जारी स्थायी गिरफ्तारी वारंट के आधार पर लखनऊ में सुरक्षा ड्यूटी पर तैनात अखिलेश त्रिपाठी को गिरफ्तार कर लिया। आरोप है कि नाम में समानता के चलते पुलिस ने गलत व्यक्ति को पकड़ लिया और उसे करीब 166 दिन तक जेल में रहना पड़ा। (aajtak.in)
15 फरवरी को हुई थी गिरफ्तारी
जानकारी के मुताबिक, राजस्थान पुलिस ने 15 फरवरी को अखिलेश त्रिपाठी को गिरफ्तार किया था। जिस अखिलेश त्रिपाठी के खिलाफ राजस्थान में स्थायी गिरफ्तारी वारंट जारी था, वह लखनऊ के अलीगंज का रहने वाला था।
लेकिन पुलिस ने वारंट में दर्ज व्यक्ति की पहचान और वर्तमान स्थिति की पर्याप्त पुष्टि किए बिना लखनऊ में सुरक्षा ड्यूटी कर रहे दूसरे अखिलेश त्रिपाठी को गिरफ्तार कर लिया। (aajtak.in)
जिस व्यक्ति के खिलाफ वारंट था, उसकी हो चुकी थी मौत
मामले में सबसे हैरान करने वाली बात यह सामने आई कि राजस्थान पुलिस जिस व्यक्ति की तलाश कर रही थी, उसकी करीब 26 साल पहले ही मौत हो चुकी थी।
बताया गया कि वारंट जिस अखिलेश त्रिपाठी के खिलाफ था, वह अलीगंज, लखनऊ का रहने वाला था। नाम और अन्य पहचान संबंधी जानकारी में समानता के कारण पुलिस ने दूसरे व्यक्ति को आरोपी समझ लिया। बाद में मामले की वास्तविकता सामने आने पर पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठे। (aajtak.in)
लखनऊ में सुरक्षा ड्यूटी पर तैनात था अखिलेश
जिस अखिलेश त्रिपाठी को राजस्थान पुलिस ने गिरफ्तार किया, वह लखनऊ में सुरक्षा व्यवस्था में तैनात था। रिपोर्ट के मुताबिक, वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सुरक्षा से जुड़े विभाग में ड्यूटी कर रहा था।
गिरफ्तारी के बाद उसे राजस्थान ले जाया गया और न्यायिक प्रक्रिया के तहत जेल भेज दिया गया। परिवार और संबंधित अधिकारियों की ओर से उसकी पहचान को लेकर सवाल उठाए गए, लेकिन उसे जेल से बाहर आने में करीब 166 दिन लग गए। (aajtak.in)
166 दिन बाद सामने आई सच्चाई
करीब साढ़े पांच महीने जेल में रहने के बाद यह स्पष्ट हुआ कि गिरफ्तार किया गया व्यक्ति वह नहीं था जिसके खिलाफ स्थायी गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ था।
मामले की जानकारी सामने आने के बाद कानूनी प्रक्रिया के जरिए अखिलेश त्रिपाठी को राहत मिली और उसे जेल से बाहर निकाला गया। इस घटना ने पुलिस की पहचान सत्यापन प्रक्रिया और पुराने गिरफ्तारी वारंटों के रिकॉर्ड को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। (aajtak.in)
पुलिस की कार्रवाई पर उठे सवाल
इस घटना के बाद पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी से पहले उसके नाम के साथ-साथ पता, उम्र और अन्य पहचान संबंधी विवरणों का सत्यापन करना महत्वपूर्ण होता है।
मामले में यह सवाल भी उठ रहा है कि पुराने स्थायी गिरफ्तारी वारंट की तामील के दौरान संबंधित व्यक्ति के जीवित होने और उसकी पहचान की पुष्टि क्यों नहीं की गई। गलत पहचान के कारण एक निर्दोष व्यक्ति को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा।
फिलहाल इस पूरे मामले को लेकर पुलिस की भूमिका और जिम्मेदारी पर चर्चा जारी है। घटना ने यह भी सवाल खड़ा किया है कि पुराने मामलों और गिरफ्तारी वारंट के रिकॉर्ड को समय-समय पर अपडेट और सत्यापित करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।


