रहमतों और बरकतों वाला महीना जारी, 26 वां रोज़ा मुकम्मल होने के बाद 27 वीं रात की खास इबादत*
*रहमतों और बरकतों वाला महीना जारी, 26 वां रोज़ा मुकम्मल होने के बाद 27 वीं रात की खास इबादत*


*इस रात आसमानी किताब कुरान मजी़द फुरकान ए हबीब नाजिल हुई यह रात हजार रातों से भी अफजल मानी जाती है इस रात को लैलतुल कद्र भी कहते हैं*
*पन्ना जिले की तहसील पवई की बड़ी जामा मस्जिद एवं नन्ही पवई मस्जिद में 26 वां रोजा पूरा होने के बाद 27 वीं शब शबे ऐ कद्र (लैलतुल कद्र) की मुबारक रात में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने पूरी रात इबादत में गुजरी इस खास रात पर लोगों ने देश और दुनिया में अमन शांति के लिए हाथ उठाकर दुआएं मांगी*
रिपोर्टर – एम पी सी जी Sky इंडिया टीवी से एमपी हेड मोहम्मद शमीम अहमद खान की रिपोर्ट
पवई रहमतों और बरकतों से भरा मुकद्दस महीना रमज़ाने मुबारक अब अपने आख़िरी अशरे पर है। 26 वां रोज़ा मुकम्मल होने के बाद मुसलमानों ने 27 वीं रात को खास इबादत के साथ गुज़ारते है। इस रात को इस्लाम में बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि इसी रात शब-ए-क़द्र (लैलतुल क़द्र) मनाया जाता है
इस्लामी मान्यताओं के अनुसार शब-ए-क़द्र वह मुबारक रात है जिसमें अल्लाह तआला ने इंसानियत की रहनुमाई के लिए पवित्र किताब कुरआन शरीफ़ को नाज़िल फरमाया। कुरआन में इस रात को हजार महीनों से भी ज्यादा अफ़ज़ल और बरकतों वाला बताया गया है। इसलिए मुसलमान इस रात में नमाज़, तिलावत-ए-कुरआन,का ज़िक्र, अपने गुनाहों से तौबा और दुआओं में मशगूल रहते हैं।
पन्ना जिले की तहसील पवई स्थित बड़ी जामा मस्जिद एवं नन्ही पवई मस्जिद में भी 27वीं रात को बड़ी तादाद में लोग जमा हुए। अकीदतमंदों ने पूरी रात मस्जिद में रहकर नमाज़ अदा की, कुरआन की तिलावत की और हाथ उठाकर दुनिया और आख़िरत की भलाई के लिए दुआएं मांगीं। इस दौरान मस्जिद का माहौल पूरी तरह इबादत और रूहानियत से भरा हुआ रहा।
इस्लामी धर्म गुरु (उलेमा) बताते हैं कि रमज़ान के आख़िरी दस दिनों की रातों—खासकर 21, 23, 25, 27 और 29—में शब-ए-क़द्र की तलाश करने की हिदायत दी गई है, जिनमें 27 वीं रात को ज्यादा अहमियत दी जाती है। इसी दौर में तरावीह की नमाज़ भी मुकम्मल हो जाती है।
इस्लामी किताबें के मुताबिक रमज़ान मुबारक के तीन अशरे (दस-दस दिन के हिस्से) होते हैं। पहला अशरा रहमत का होता है, जिसमें अल्लाह की रहमत और बरकतें नाज़िल होती हैं। दूसरा अशरा मग़फिरत का होता है, जिसमें बंदों के गुनाहों की माफी मांगी जाती है। तीसरा और आख़िरी अशरा जहन्नम से निजात पाने का माना जाता है, जिसमें ज्यादा से ज्यादा इबादत और तौबा की जाती है।
बताया जाता है कि रमज़ान के 29 या 30 रोज़े मुकम्मल होने के बाद चांद देखा जाता है। चांद नजर आने के बाद मुसलमान खुशी और भाईचारे के साथ ईद-उल-फितर का त्योंहार मनाते हैं। इस तरह रहमतों और बरकतों से भरा यह पाक महीना अलविदा होने की तरफ बढ़ रहा है और लोग अल्लाह तआला से अपनी इबादतों की कबूलियत की दुआ कर रहे हैं। कुरान में आता है कि इस रात में फरिश्ते आसमान से जमीन पर आते हैं और देखते हैं की कौन बंदा अपने रब से अपनी गुनाहों के लिए रो-रो कर माफी मांग रहा है फिर जाकर अल्लाह ताला से वह दरियाफ्त करते हैं और कहते हैं या मेरे रब तेरा बंदा मस्जिद में रो-रो कर रमजान के मुबारक महीने में शबे कद्र की रात में अपनी गुनाहों की मगफिरत मांग रहा था इसलिए मुसलमान को चाहिए कि इस पाक रात में ज्यादा से ज्यादा इबादत करें और सभी के लिए हाथ उठाकर दुआएं मांगे